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9-27

「我は信ぜず」とよめとでも?

| 01:42 |  「我は信ぜず」とよめとでも?を含むブックマーク

 フォロワーさんの引用RTで見かけたのですが・・・


 この方はフォロワー数が多いので、やはり一言いっておくべきかと。

 大伴家持の歌(『万葉集』巻四・774)にこういうのがあります。原文は、

百千遍恋跡云友諸弟等之練乃言羽者吾波不信

 これは「百千度(ももちたび)恋ふといふとも諸弟らが練りのことばは『吾波不信』」というわけで、第五句は「われは頼(たの)まじ」(私は信じない)とよむものでしょう。おそらく漢字が伝来する以前からあったであろう古語「たのむ」は、何かを全面的に信用して身をゆだねるという意味で、まさに「信」そのものです。あてるべき訓が日本語になかったとは、ふざけた話ですね。

 「信」の字を「たのむ」とよむ確実な例がないので慎重になるべきだと言われればそれはそうなのですが、いずれにせよ、これは和歌の表現です。戯れの歌や、後世の釈教歌とかでない限り和歌に漢語は用いないのであって、たとえば「信ぜず」などは論外だといわざるをえません。

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9-1

本棚メモ

| 19:37 |  本棚メモを含むブックマーク

 2017年度に入ってから当社比数倍の忙しさになり、本棚に入れたい新刊書リストの更新を怠ってきましたが、新刊をチェックしないのは自分のためにもならないので、新学期開始も近いですし、再開します。これからは本棚に「飾る」だけでなく、なるべく「読む」ぞ・・・!

古代東国の地方官衙と寺院

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 渡部氏、こんな本を・・・

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源 頼義 (人物叢書)

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 この仕事はより適任の方がやるべきだと思うのですが・・とまれ、買わざるを得ないか・・・

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